Wednesday, 4 January 2012

भाषा, बोली और लोकसंगीत



 मेरा जन्मस्थान दिल्ली है जो तमाम भाषाओँ और संस्कृतियों को अपने में समेटे हुए है और एक छोटे भारत की छवि प्रस्तुत करती है!  हमेशा से गैर-हिंदी भाषियों को जब दिल्ली में हिंदी बोलते हुए देखती थी तो रश्क होता था उनसे!  अपनी एक निजी भाषा या बोली होते हुए भी वे बड़ी सुगमता से सीखकर हिंदी अपना लिया करते थे!  मेरे पिता कई भाषाओँ/बोलियों में प्रवीण  हैं  ! बस उनसे ही प्रेरणा लेकर मैंने भी छोटी सी उम्र में ठान लिया था कि वे सब मुझे भी सीखना है!  दादाजी राजस्थान के रहनेवाले थे, उनसे मैंने थोडा बहुत राजस्थानी बोलना सीखा, चूँकि वे अलवर के नजदीक के रहने वाले थे और वहां मारवाड़ी नहीं बल्कि थोड़ी हिंदी मिश्रित राजस्थानी बोली जाती है इसलिए मुझे सीखने में कोई कठिनाई नहीं हुई!  २-३ बार थोडा वक़्त राजस्थान में गुजरा तो वहां कि भाषा, बोली और संगीत को करीब से जानने का अवसर मिला!  शाम के वक़्त लड़कियों का हुजूम बाग में सैर करते वक़्त  गाया  करता था.....

"ले आयो काली चुनरी, मेरो नाय मन राजी होए.........

या फिर गया जाता था ये गीत.....

"कालो कूद पड्यो मेला में, साईकल पंचर कर लायो, अर रा रा रा रा रा रा रा हे......

हमारे पड़ोस के घरों में कई हरियाणवी जाट परिवार रहते थे!  प्रगाढ़ संबंधों के चलते मुझे नजदीक से उनकी भाषा, संस्कृति और लोकगीतों का सीखने का सुअवसर मिला!  बचपन से सुनती आई थी लिहाजा इस बोली को मैंने मातृभाषा की भांति आत्मसात कर लिया!  यहाँ तक कि उन लोगों से मैं हरियाणवी में ही बात करती थी!  शादी-ब्याह और अन्य अवसरों पर गए जाने वाले काफी सारे गीत "बन्ने-बन्नी" और "जकड़ी" तो मैंने खेल-खेल में ही सीख लिए!  हरियाणा में पुरुषों द्वारा गए जाने वाले एक अन्य लोकगीत जिसे "रागनी" कहा जाता है को मैंने बड़े चाव से सुना है! इसमें कुछ खास वाद्य यंत्रों जैसे मटका आदि का प्रयोग किया जाता है!  उन दिनों स्कूल में भी मैंने हरियाणवी, राजस्थानी, कश्मीरी, गुजराती लोकगीतों को सीखा, साथ ही उनसे जुडी नृत्य-शैली को सीखने का मौका भी मिला!  हरियाणवी में "मने बोरला घड़ा दे रे ओ ननदी के बीरा......"  राजस्थानी में "म्हारो छैल भंवर  रो   अलगोझा....."....कश्मीरी/डोगरी में "कैती फुल हम लो गुलाबो लो......", गुजराती में "धरणी धम धम......(डांडिया)....आदि गीतों को सीखा और जाना कि विभिन्न प्रदेशों के गीतों को किस लहजे में गाया जाता है, और किस तरह के डांस मोवमेंट प्रयोग में लाये जाते है! मतलब हर क्षेत्र की एक खास पहचान! 

दिल्ली में रहने वाले पंजाबियों की बहुलता के कारण यहाँ के रहन-सहन, खान-पान, भाषा-संस्कृति पर पंजाबियत का असर साफ परिलक्षित होता है! संगीत भी इससे अछूता नहीं है!  एक सिख सहेली के साथ ने मुझे भी पंजाबी सीखने को प्रेरित किया!  उन दिनों दूरदर्शन पर हर शनिवार को प्रादेशिक भाषा की फिल्में दिखाई जाती थी!  उनसे भी मैंने काफी पंजाबी सीखी!  कुछ अपने पड़ोस में रहने वाले लोगों को बोलते सुनकर भी मैं जल्द ही पंजाबी बोलना सीख गयी!  अब बारी थी संगीत की!  सबसे पहले मैंने उसके साथ गुरबानी गाना सीखा, और सुर में सुर मिला कर हम दोनों गाया करते थे.....सतनाम वाहेगुरु......फिर मैंने पंजाबी लोकगीत सीखे!  पंजाब का खास लोकनृत्य है ...भांगड़ा! और लड़कियां "गिद्दा" करती हैं!  जिसमें सब लडकियां चंद्रकार या अर्धचन्द्राकार गोला बनाकर खड़ी हो जाती हैं और दो-दो  लडकियां बारी-बारी बीच में आकर पंजाबी शैली में नाचती हैं और बाकि ताली बजाकर छोटे-छोटे टुकड़ों में लोकगीत गाती हैं जिन्हें बोलियाँ या टप्पे कहा जाता है! मैंने कई गीत सीखे जिन्हें दिल्ली में बड़े चाव से गाया जाता है.....

"काला डोरिया कुंडे नाल अड़या ए ओये, के छोटा देवरा भाभी नाल लड्या ए ओये"

या फिर "लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग माहिया, आओ सामने कोलो असी रुस के न लंग माहिया...." 

मेरे ऑफिस में मुझे एक सहकर्मी से थोड़ी सी तमिल भी सीखने को मिली! और वहीँ कुछ गुजराती भी सीखी!  विवाह के पश्चात मैंने पाया कि मेरे ससुराल में ब्रजभाषा बोली जाती थी, जो कि बड़ी ही मीठी लगती है सुनने में! कुछ वक़्त में ही मैंने उसे सीखना शुरू कर दिया!  थोडा वक़्त उत्तर प्रदेश में रहने का मौका मिला, तो मैंने इस भाषा और लोकगीतों को सीखने पर पूरा ध्यान दिया!  थोड़े ही दिन में मैंने सब सीख लिया!  ब्रजप्रदेश में महिलाएं बड़े ही मनोयोग से "लांगुरिया" गाती हैं जो सुनने में बहुत ही मधुर लगता है!  मैंने भी बहुत से गीत सीखे! 

"देख पल्ला छोड़ दे लांगुरिया, बतासों दूंगी तोय पल्ला छोड़ दे......."


यूँ लोकगीतों की भांति विभिन्न प्रान्तों के लोकनृत्यों की भी अपनी एक अलग पहचान और शैली होती है!  जैसे राजस्थानी नृत्य में बाजुओं और कलाईयों का भरपूर प्रयोग किया जाता है, हरियाणवी नृत्य में हाथ के अंगूठे को कंधे से लगा कर, या दोनों हाथ फैला कर अंगूठों का प्रयोग कर नृत्य किया जाता है, वहीँ पंजाबी भांगड़ा में पुरुष कन्धों और हाथों का खास मुद्रा में प्रयोग कर नाचते हैं तो गिद्दे में महिलाएं ताली बजाकर नाचती हैं!  गुजराती लोकनृत्य "गरबा" में महिलाएं ताली का प्रयोग करती हैं तो "डांडिया" में महिला और पुरुष दोनों डंडियाँ लेकर नाचते हैं!  कश्मीरी लोकनृत्य में महिलाएं एक दूसरे की कमर में हाथ डाल कर एक श्रृंखला बना लेती हैं और बारी-बारी एक-एक पैर को विपरीत दिशा में उठाते हुए नाचती हैं!   महाराष्ट्रीय लावणी में यूँ तो पूरा बदन तेजी से थिरकता है पर पैर के पंजों का विशेष इस्तेमाल किया जाता है!       

इन लोकगीतों में रची-बसी उस प्रदेश की संस्कृति सहज ही मन मोह लेती है! इसके अतिरिक्त मुझे भोजपुरी, अवधी के गीत भी बहुत भाते है, ये बात और है कि इन भाषाओँ पर अधिकार नहीं मिल पाया है अभी! आने वाले समय में मैं कुछ और भाषाएँ सीखना चाहूंगी! यदि मौका मिला तो बांग्ला और मराठी सीखना चाहूंगी, ताकि रविन्द्र्संगीत और लावणी का आनंद उठा सकूँ!

अंजू शर्मा  

5 comments:

  1. App ne virasat ko sanjoya hai -- bahut khoob

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  2. ak sundar pravishti ke liye bahut bahut abhar.

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  3. आपकी प्रस्तुति अच्छी लगी । मेरे नए पोस्ट "लेखनी को थाम सकी इसलिए लेखन ने मुझे थामा": पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद। .

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    1. सार्थक पोस्ट, सादर.
      कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधार कर स्नेह प्रदान करें.

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  4. हमारी बोलियाँ हमारी धरोहर हैं...... अच्छा लगा आपकी रूचि के बारे में जानकर

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